Vipradas (Hindi)Author/s: Sarat Chandra Chattopadhyay
समाज के तथाकथित उच्च, विशेषतया ब्राह्मण वर्ग में पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों का कितना और किस प्रकार शोषण किया जाता रहा है, इस का प्रत्यक्ष उदाहरण है शरतचंद्र चट्टोपाध्याय का बहुचर्चित उपन्यास ‘विप्रदास’।
ऊंचनीच, छुआछूत, संध्यापूजा आदि पाखंडों के चलते समाज में सरल हृदया नारियों की कोमल भावनाओं से कैसे खिलवाड़ किया जाता है-यह भी विप्रदास का प्रमुख वर्ण्य विषय है। परंपरागत बंधनों से मुक्त होने की छटपटाहट को रेखांकित करना शरतचंद्र की प्रमुख विशेषता है, जो विप्रदास में भी सहज ही देखी जा सकती है।
ऊंचनीच, छुआछूत, संध्यापूजा आदि पाखंडों के चलते समाज में सरल हृदया नारियों की कोमल भावनाओं से कैसे खिलवाड़ किया जाता है-यह भी विप्रदास का प्रमुख वर्ण्य विषय है। परंपरागत बंधनों से मुक्त होने की छटपटाहट को रेखांकित करना शरतचंद्र की प्रमुख विशेषता है, जो विप्रदास में भी सहज ही देखी जा सकती है।
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128 pages
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Category: Fiction
Tag: Sarat Chandra Chattopadhyay
